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यूनिफार्म सिविल कोड क्या है? इसके लागू होने से क्या होगा ?

uniform civil code in hindi

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा के घोषणा पत्र के बाद एक बार फिर देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता चर्चा में है। भाजपा ने कर्नाटक में अपने चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया है कि वह सत्ता में आती है तो कर्नाटक राज्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करेगी। खैर, यह तो हुई दूसरी बात लेकिन हम बात करेंगे यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता को लेकर।

जब से देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता को लेकर चर्चा शुरू हुई है, लोग जानना चाहते हैं कि आखिर यूनिफॉर्म सिविल कोड क्या है? आज हम यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता को आसान भाषा में समझेंगे।

यूनिफॉर्म सिविल कोड क्या है?

समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड का सीधा अर्थ होता है भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। अगर भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होता है तो देश में शादी, तलाक और जमीन-जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा।

यूनिफॉर्म सिविल कोड या समान नागरिक संहिता एक निष्पक्ष कानून होता है जो सभी धर्मों के लोगों के लिए समान रूप से लागू होता है। वर्तमान में देश हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ के अधीन करते हैं। देश में फिलहाल मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय का अपना पर्सनल लॉ है जबकि हिन्दू सिविल लॉ के तहत हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं।

समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code )

यूनिफॉर्म सिविल कोड या समान नागरिक संहिता पूरे देश के लिए एक कानून सुनिश्चित करेगी, जो सभी धार्मिक और व्यक्तिगत मामलों जैसे संपत्ति, विवाह, विरासत और गोद लेने आदि में लागू होगा। यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने के बाद हिंदू विवाह अधिनियम (1955), हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून आवेदन अधिनियम (1937) जैसे धर्म पर आधारित मौजूदा व्यक्तिगत कानून तकनीकी रूप से निरस्त हो जाएंगे।

देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड के साथ ही अनुच्छेद 44 की भी चर्चा हो रही है क्योंकि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू किए जाने के पीछे आर्टिकल 44 को ही आधार बनाया जा रहा है। आइए, हम समझते हैं कि अनुच्छेद 44 क्या है?

अनुच्छेद 44 क्या है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 के मुताबिक, राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा।

इसका अर्थ यह है कि भारत का संविधान, सरकार को सभी समुदायों को उन मामलों पर एक साथ लाने का निर्देश दे रहा है, जो वर्तमान में उनके संबंधित व्यक्तिगत कानूनों द्वारा शासित हैं। हालांकि, यह राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में एक है।

भाजपा यूनिफार्म सिविल कोड क्यों लागू करना चाहती है?

समान नागरिक संहिता यानी यूनिफार्म सिविल कोड का मुद्दा देश में लंबे समय से बहस का केंद्र रहा है। यह शुरुआत से ही भाजपा के एजेंडे में भी शामिल रहा है। बीजेपी लंबे समय से देश में एक कानून की पक्षधर रही है। भाजपा ने हमेशा जोर दिया है कि लेकर संसद में कानून बनाया जाए। भाजपा के 2019 लोकसभा चुनाव के घोषणा पत्र में भी यूनिफार्म सिविल कोड था।

यूनिफॉर्म सिविल कोड की शुरुआत कैसे हुई?

समान नागरिक संहिता या यूनिफॉर्म सिविल कोड की उत्पत्ति औपनिवेशिक भारत में हुई, जब ब्रिटिश सरकार ने 1835 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर अपराधों, सबूतों और अनुबंधों से संबंधित भारतीय कानून के संहिताकरण में एकरूपता की आवश्यकता पर जोर दिया। इसमें यह भी सिफारिश की गई कि हिंदुओं और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों को इस तरह के संहिताकरण के बाहर रखा जाए।

ब्रिटिश शासन के अंत में व्यक्तिगत मुद्दों से निपटने वाले कानूनों की संख्या में वृद्धि के कारण भारत सरकार ने 1941 में हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने के लिये बी.एन. राव समिति का गठन किया।

सरकार द्वारा हिंदुओं, बौद्धों, जैनों और सिखों के लिये निर्वसीयत उत्तराधिकार से संबंधित कानून को संशोधित एवं संहिताबद्ध करने के लिए 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम विधेयक लाया गया। हालाँकि मुस्लिम, इसाई और पारसी लोगों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून थे। ऐसे में यह मांग चालीस के दशक से ही उठती रही है कि देश के सभी नागरिकों के लिए एक कानून होना चाहिए।

यूनिफॉर्म सिविल कोड क्यों जरूरी है?

अब सवाल उठता है कि भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड क्यों जरूरी है? देखिए आज भारत में जाति और धर्म के आधार पर अलग-अलग कानून और मैरिज एक्ट हैं, इसके कारण सामाजिक ढ़ांचा बिगड़ा हुआ है। यही कारण है कि देश में लगातार यूनिफॉर्म सिविल कोड की मांग उठती रही है ताकि सभी जाति, धर्म, वर्ग और संप्रदाय को एक ही सिस्टम में शामिल किया जा सके।

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