History and Religion

कहानी एक ऐसे महाराजा की जिनके नाम पर भारत में शुरू हुई रणजी ट्रॉफी

महाराजा रणजीत सिंह

यूँ तो देश में कई राजा, महाराजा हुए हैं।  लेकिन आज हम आपको एक ऐसे महाराजा के बारे में बताएँगे जो महान क्रिकेटर थे। उन्होंने अपनी राजधानी में कई विकास कार्य भी करवाए थे।  क्रिकेट में उनका बनाया एक रिकॉर्ड आज भी करीब 118 साल से कोई नहीं तोड़ पाया है। हम बात कर रहे हैं गुजरात के नवागर रियासत के जाम साहब महाराजा रणजीत सिंह जी विभाजी जडेजा की। आइए उनके बारे में जानते हैं।

राजा रणजीत सिंह जी कौन है ?

फादर ऑफ इंडियन क्रिकेट के नाम से विख्यात राजा रणजीत सिंह का जन्म 10 सितंबर 1872 में गुजरात के नवानगर में हुआ था। उनका पूरा नाम ‘सर रणजीत सिंह जी विभाजी जड़ेजा ‘ था। वे नवानगर रियासत के महाराजा थे। उन्हें ‘नवानगर के जाम साहब’, ‘कुमार रणजीत सिंहजी’, ‘रणजी’ और ‘स्मिथ’ जैसे प्रसिद्ध नामों से भी बुलाया जाता था। सर रंजीतसिंह जी विभाजी (Sir Ranjit singhji Vibhaji jadeja) नवानगर के महाराजा जाम साहिब होने के साथ ही दुनिया के महानतम क्रिकेट खिलाड़ियों में से एक थे। रणजीत सिंह जी की मृत्यु के एक साल बाद 1934 में उनके नाम से भारत में रणजी ट्रॉफी (Ranji Trophy) का आयोजन किया जाता है।

रणजीत सिंह विभाजी जड़ेजा का जीवन परिचय

रणजीत सिंह विभाजी जड़ेजा का जन्म काठियावाड़ के नवानगर के सरोदर गांव में एक राजपूत परिवार में हुआ था। इनके पिताजी का नाम जीवनसिंहजी था। उनका जन्म एक किसान परिवार में हुआ लेकिन वे बाद में नवानगर के जाम साहिब बन गए। महाराजा रणजीत सिंह जी (Sir Ranjitsinhji Vibhaji) को साल 1907 में नवानगर रियासत का महाराजा बनाया गया। उन्होंने नवानगर की राजधानी जामनगर का बहुत विकास करवाया। जामनगर का आधुनिकीकरण कर और नवानगर के बंदरगाह का विकास किया। उन्होंने यहाँ सड़कों, रेलवे और सिंचाई सुविधाओं का भी निर्माण किया।

ब्रिटिश टीम के लिए खेला था फर्स्ट क्लास क्रिकेट

महाराजा रणजीत सिंह जामनगर विरासत के 10वें जाम साहब और प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी थे। उन्होंने ब्रिटिश क्रिकेट टीम के लिए फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेला था। वे एक बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी और पहले ऐसे भारतीय ​थे जिन्होंने प्रोफेशनल टेस्ट मैच और अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेला था। रणजीत सिंह जी को क्रिकेट में कई नए शॉट ईजाद करने के लिए भी जाना जाता है। रणजीत सिंह जी ने क्रिकेट खेलना स्कूल के दिनों में शुरू किया था। कॉलेज के दौरान वे राजकुमार कॉलेज राजकोट के कप्तान रहे। इसके बाद रणजीत सिंह को आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड की प्रसिद्ध कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी दाख़िला मिल गया।

ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ टेस्ट पदार्पण

इंग्लैंड में महाराजा रणजीत सिंह की क्रिकेट में रूचि बढ़ने लगी और वे पढ़ाई पर खास ध्यान नहीं दे पाए। उन्होंने क्रिकेट में ही कॅरियर बनाने की सोची और अपना पूरा फोकस क्रिकेटर बनने में लगा दिया। वह सबसे पहले कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के लिए खेले। इसके बाद ससेक्स क्लब से जुड़ गए। अपने पहले ही मैच में उन्होंने 77 और 150 रन की जबरदस्त पारियां खेली थी। काउंटी क्रिकेट में अच्छे प्रदर्शन के ​आधार पर महाराज रणजीत सिंह का चयन इंग्लैंड की राष्ट्रीय क्रिकेट टीम में हो गया। सन् 1896 में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ अपना टेस्ट पदार्पण किया था।

इस मैच में महाराजा रणजीत सिंह ने 62 और 154 रन की नाबाद पारियां खेली। उन्होंने लगभग चार साल क्रिकेट खेला और 15 टेस्ट मैचों में 44.89 की औसत से 989 रन बनाए थे। इसमें दो शतक और छह अर्धशतक शामिल रहे। उन्होंने प्रथम श्रेणी में 307 मैच खेलते हुए 72 शतक और 109 अर्धशतक लगाए। रणजीत सिंह ने 56.37 की औसत से 24 हज़ार 692 रन बनाए थे। वे उस समय के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक थे। नेविल कार्डस ने उन्हें ‘द मिडसमर नाइट्स ड्रीम ऑफ क्रिकेट’ भी कहा था।

इसके बाद वे भारत लौट आए। उन्होंने अपना आखिरी मैच सन् 1920 में 48 वर्ष की उम्र में खेला था, जिसमें रणजीत सिंह जी ने 39 रन बनाए थे। सबसे खास बात यह कि टेस्ट क्रिकेट में एक दिन में दो शतक लगाने का 118 साल पुराना उनका रिकॉर्ड आज तक कोई भी बल्लेबाज नहीं तोड़ पाया है।

महाराजा रणजीत सिंह का 2 अप्रैल, 1933 को 60 वर्ष की उम्र में गुजरात के जामनगर में निधन हो गया था। इसके करीब दो साल बाद पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह ने उनके क्रिकेट में योगदान को देखते हुए उनके नाम पर सन् 1935 में रणजी ट्रॉफी की शुरुआत की। महाराज रणजीत सिंह के भतीजे दलीप सिंह ने भी इंग्लैंड के लिए क्रिकेट खेला था। इसके बाद उनके नाम पर भारत में दलीप ट्रॉफी की शुरुआत हुई थी। एक बार निशानेबाजी के दौरान उनकी एक आँख चली गई थी। जिसके बाद उनका क्रिकेट करियर धीमा पड़ गया।  लेकिन क्रिकेट जगत में उन्होंने जो मुकाम हासिल किया, उसके लिए उनका नाम आज भी बड़े सम्मान से लिया जाता है।

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